आज चार दिन हुए वो नही हे
क्या किया जाय ईन यादो को
न कोई अलमारी ना कोई तयखाना
बिना चावी के ही खुल जाती हे
दस्तक दिए बिना आती हे
और आपपे हावी हो जाती हे
तनहाँयीया(यादे)
तुम नही होती तो तुम्हारा ज़िक्र हर लब से करते हे
दोस्त यारो मे तुम्हारी बाते यूही छेड़ते
और हम बहक जाते हे
तुम होती तो ऐसा करते, हम करते वैसा
एक एक ख़याल दिल को छूके सपने बुनता हे
लहरो के ईजाजत बीना ही रेत का घर बनाते हे
क्या नही करते आपकी यादो मे
मासूम गलियो से पूछते आपका पता
उन बरतनो पे रख के हाथ आपको महसूस करते हे
बाते चंद ईन खाली दीवारो से
उनमे ही छुपे आपके ही अक्ससे
जो यहाँ आज छोड़ आए हे
गर फर्श पे लेटे
उसी गर्मी को हम आज याद किए जा रहे हे
-धनंजय
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Monday, 7 March 2011
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